"चल अविनाश अब चलते है मन की उड़ान हम भरते हैं. बंद आँखों की बातो को,अल्हड़ से इरादों को, कोरे कागज पर उतारेंगे अंतर्मन को थामकर,बाते उसकी जानेंगे चल अविनाश अब चलते है मन की उड़ान हम भरते है"
शनिवार, 21 मार्च 2015
खुशियो का एक लम्हा
गुरुवार, 19 मार्च 2015
नटखट
खुद में मस्त रहते हो,
भोले भाले हो,
हो तुम नादान।
अकल के कच्चे हो,
प्यारे बच्चे हो।
तुम्हे रंग अभी खुद में भरना है,
आगे बहुत कुछ करना है
छोड़ना ना तुम
मीठे सपनो की डोर को
ये ले जाएगी तुम्हे ये
नई एक भोर को।
मंगलवार, 17 मार्च 2015
हवा
रविवार, 15 मार्च 2015
शनिवार, 14 मार्च 2015
इतिहास कोई खास नहीं आम ही रचता है
"अधिकतर..कुछ खास या बड़े काम करने वाले को ही याद किया जाता है या फिर महान ना भी हो तो लोगो की नजर में महान होने पर उसको याद किया जाता है ऐसेवाले उदाहरण बहुत है हमारे राजनितिक इतिहास में
पर किसी को खास बनता कौन है आम इंसान ही बनता है हाँ इनको याद करना पड़ता है क्युकी महान लोग दुनिया से चले भी जाते है
पर आम इंसान तो कभी नहीं जाता...वो आज भी वही है कल भी वही था पहले मालिको सामंतो की गुलामी की तो कभी जमींदार का कर्जदार बंधुआ मजदूर बना तो कभी खेतिहर मजदूर तो एक दिहाड़ी मजदूर तो पूंजीवादी/नौकरशाही युग में दिन रात मेहनत कर अपने परिवार के लिए छोटी छोटी खुसिया बटोरने में लगा मद्यवर्गीय आदमी या सर पे बोझ उठाने वाली रेजा अपने घर की संवारती एक गृहणी .
या घर और नौकरी के बीच झूलती एक नौकरीपेशा. ये आम लोग तो कल भी वैसे ही थे आज भी वैसे भी है बस समय बदला चेहरे बदले किरदार तो वही है ये तो इतिहास से कभी गया ही नहीं और ये आम इंसान तो हमेसा रहेगा और इतिहास रचता रहेगा किसी को महान बनाएगा तो किसी को भुला देगा...पर ये तो अनवरत हर समय में जीवन को चुनौती देता रहेगा छोटी छोटी खुसिया बटोरता रहेगा हम आम नहीं हम खास है क्युकी हमारे कारन ही तो कोई खास है "
शुक्रवार, 13 मार्च 2015
बिखरी बातें
ये बिखरी बातें,बेचैन सी रातें।
यूँ चुप-चुप सी,अनसुनी आहटें।
दिल की बातें कहने को,
भावों की धार में बहने को,
में हर-पल तत्पर रहता हूँ;
बस तेरी बाते कहता हूँ।
जाने कैसा उन्माद है ये,
जो मुझमे उठता रहता है।
तुझे कह दूँ की चुप रह जाऊँ,
इस बोझ को कैसे सह पाऊँ।
बिन कहे ही तुम सब सुन लो न,
आँखों को मेरी पढ़ लो न।
हर पल तेरे ख्वाब सजाता हूँ,
रूठ कर तुझसे मैं;
खुद ही खुद को मनाता हूँ।
कभी आकर तुम मना लो न,
मेरे बिखरे ख्वाब सजा दो न।
बेरंग सी है जिंदगी ये,
इसे प्यार का रंग लगा दो न।
- अविकाव्य
गुरुवार, 12 मार्च 2015
नासमझ
हाँ मैं नासमझ हूँ,
बचपन की में ललक हूँ।
मैं तो कच्ची मिटटी हूँ,
बेगाने अकार को निकली हूँ।
हर रंग में ढल जाती हूँ,हर नब्ज में मिल जाती हूँ।अव्यवस्थित सा मैं साज हूँ,असंगठित आगाज हूँ।मैं खुद से बाते करती हूँबेहमतलब में मै हँसती हूँ।मुझे हर को सच्चा लगता है,अंजान भी अच्छा लगता हैहर चिंता से आजाद हूँ मैंहाँ अभी तो बस शुरुआत हूँ मैं।
नादान सी उड़ान
बेनाम सी मंजिल को
ऑंठो पहर मन के सहर
न कोई फिकर न गम का जिकर
आत्मा को टटोलूंगा
भावनाओ के बोल बस बोलूंगा
न रुकना है न थकना है
कल्पना के इस यान पर
अनवरत बढ़ता रहना है।
उमंगें जो मनके अंदर हैं
अनदेखी सी जो थिरकन है।
हाँ इनके साज पे डोलूँगा
ख्वाबो के साथ मैं जी लूँगा
मदमस्त सी राह पे निकला है
बेमतलब छलांग लगता है
बस अनकहे बोल बताता है
बस यूँही ये उड़ता रहे
बस गिर गिर केे सम्हलता रहे।
ये आवारा सा बादल रहे
बेमौसम बरसता रहे।
बुधवार, 11 मार्च 2015
आशा का गीत
मेरी कविता
दिल की फसल
आ रही है जिन्दगी
नए एहसासों के साथ।
उमंगो की नई पंखुडियो के
खिलने का आधार लिए।
मन के किसी कोने में दबे थे
इशारा दे रहा है समय
कल्पना की सुनहरी रंगीन सी
उड़ान भरने जाने का।
शोर कर रही है हवाएँ अब
उड़ना है आसमान में।
निराशा के हर पल को
के कही से तो आएंगी
हाँ हो सकता है ये
फिर भी उठ तो रहे है
उल्लास की अमरबेल है
विश्वास के सहारे बढती हुई।
ले के सहारा आत्म-
हाँ ये मौका है कुछ कर गुजरने का
सोमवार, 9 मार्च 2015
अधूरी चाहत
कहना चाहता था तुमसे
ख्वाबो की गहरी नदी में
डूबना था तेरी आँखों में
झिझकता था मै तुमसे
तुम मुझसे कतराती थी
कह न सका कोई कुछ भी
अनसुनी आहें भरते रह गए।
तुम्हारी एक झलक के लिए
गुलाबी ठण्ड में नंगे पांव
तुम जब भी नजरें उठाई थी
भावना के उन्माद को
तुम आये हो
शायद तुम आये हो।
सूने सूने मन के आंगन में ये खिलखिलाहट कैसी
गुमसुम सी इस सुबह में ये कलरव कैसा
शायद तुम आये हो।
वीरान से इन रास्तो पर ये बहार कैसी
शायद तुम आये हो।
शायद तुम आये हो।
शायद तुम आये हो।
आज फिर चुन रहा हूँ मोती चाहत के
शायद तुम आये हो।
हाँ रुकने को थी सांसें बेमतलब सा था जीवन
शायद तुम आये हो
"नई नस्लों का जीवन धन्य कर दो"
तितलियों में थोड़ी और रंगत भर दो। जुगनुओं में थोड़ी और चमक भर दो। फूलों को ज्यादा खुशबुएँ दे दो। हिमानियों को अधिक सुदृढ़ कर दो। जल धाराओं को अ...
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हर रोज मरता हूँ, हर रोज जीता हूँ। न मैं मर पाया पूरा, मेरा जीना भी रह गया थोड़ा। कुछ तो रह गया अधूरा। जीना भी है, और मरना भी है। ये अवश्यसंभा...
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एक खुला चारागाह था वो। जानवरो के कूछ झुंड पहले से वहीं थे। कुछ भोजन की तलाश में आते गए। कुछ सिमट कर रह गए। कुछ तादाद बढ़ाते गए। कुछ वापस ...
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(पीड़ाएँ ) पीड़ाएँ कभी लुप्त नही होतीं उनकी अनदेखी कर दी जाती है। * (वेदनाएँ) वेदनाएँ कभी मृत नही होतीं हमारे आँसू संकीर्ण हो जाते हैं। ** (सं...