शनिवार, 25 जून 2016

शीर्षक रहित

"कुछ को मिल गए,
कुछ को मिलने बाकि है,
भावनाएं बहूत सी हैं
कतार में,
बाँट जोह रही शब्दों की।"

रविवार, 12 जून 2016

स्वयं की तलाश

कुछ गहरा
कुछ अप्रत्याशित सा
अभी खुद से हु
अंजान जरा।
कभी पोखर सा हु
बंधा हुआ,
कभी सागर सा अथाह हु मैं।
कभी उजला हु सबेरे सा,
कभी अंधला हु अँधेरे सा।
है असीमित इक्षाए भी,
है जज्बा भी अनंत सा,
चाह भी है असंभव की
कोसिस भी है हर सम्भव की।"

गुरुवार, 2 जून 2016

देवता और शैतान

"देवता और शैतान दोनों
अंतर्मन में समाहित हैं|
एक नैतिकता का
पथदृष्टा है,
दूजा अनीति का
सहवृत्ता है।
ऊर्जा दोनों से
प्रचुर है,
साधन दोनों के अपूर्व है।
एक चरित्र का निर्माण है,
दूजा पतन का आगाज है।
चुनाव स्वंय के हाथ है,
के अब हम
सुनीति के साथ है
या अनीति के सम-भाग हैं।"



शनिवार, 19 सितंबर 2015

नज्म-2

"जरा वाजिब था,
कुछ गैर जरुरी सा,
अफ़साना ये दिल का फिजूल था.
तेरे रुखसार की आहटे,
सलवटों में सिमट गयी,
कुछ पल को.
चुभती सी आह एक ,
बाकि रह गयी.
अनकही सी बात एक,
बाकि रह गयी.
ना मुकम्मल हुआ,
ना खत्म हुआ.
थम सा गया,
सब एक लम्हे में "

गुरुवार, 17 सितंबर 2015

मेरी कविता

"उत्साहित था,
जब उभरी थी तुम
पहली बार।
सरसराती नजरो से,
तो कभी एकटक देखा तुम्हे,
असीम संतुष्टि संग लिए,
उभरी थी तुम।
मैंने ही गढ़ा था तुम्हे,
मेरे अंतर्मन की ,
आभा थी तुम।
मेरी सिसकियो,
खिलखिलाहट,
मेरी फिसलन,
प्राप्तियों,
सबको तुम आवाज देती हो।
मेरी सच्ची साथी,
मेरी आशा,शांति,
मेरे अंतर्मन की,
परिभाषा हो तुम।"


सोमवार, 6 जुलाई 2015

समर्पण

"मन और मष्तिष्क का अंतर
शून्य हो गया
ये एकरूपता तुमसे ही है
दोनों के द्वन्दो से मुक्त
मै स्वक्षंद हो गया
ये अल्हड़ता तुमसे ही है
तर्क और भावना का जुड़ाव हो गया
इस सम्भावना का आविर्भाव हो गया
ये गठबंधन तुमसे ही है
आकांक्षा और संतुष्टि
एकटक हो गये
ये समागम तुमसे ही है
राग ,द्वेश छुधा,तृष्णा
का अंत सब तुमसे ही है"

"नई नस्लों का जीवन धन्य कर दो"

तितलियों में थोड़ी और रंगत भर दो। जुगनुओं में थोड़ी और चमक भर दो। फूलों को ज्यादा खुशबुएँ दे दो। हिमानियों को अधिक सुदृढ़ कर दो। जल धाराओं को अ...