गुरुवार, 19 मई 2022

" वो भावों का भूखा था"

वो भावों का भूखा था।

शांत करना चाहता था,
लेखनी की पिपासा।
करके भावों का ग्राह।
मंद नहीं पड़ा कभी भी,
भाव क्षुधा का ताप।
असीम रही उसकी भूख,
बढ़ती रही प्यास।

उत्सव,उल्लास,शोक,विलाप
अपूर्ण ही थे,इन सब के भाव।
असंतुष्ट रहा हर क्षण
ढूंढ़ता रहा भावों की थाह।

सोमवार, 16 मई 2022

"तुम ये कर सकते हो"

कुछ सुषुप्त संभावनाएं
सबके भीतर पलतीं रहतीं हैं।

हम अक्सर अंकित करते हैं उनपर;
अतिरिक्त सुषुप्तता।
ये कहकर की तुमसे नही हो पाएगा।

अपितु हम दे सकते हैं उनको;
सकारात्मक उद्दीपन ।
ये कहकर की तुम ये कर सकते हो।

"तुम ये कर सकते हो"  💙

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2022

जद्दोजहद

पहले पहल हर वक्त माँ को,
अपने आस-पास ही पाने की जद्दोजहद।
फिर माँ के आँचल से छूटकर,
कहीं बाहर भाग कर जाने की जद्दोजहद।
फिर कांधे पर बस्ता लादकर,
पढ़ाई के बोझ से पार पाने की जद्दोजहद।
उठाकर पिता की उम्मीदों का बोझ,
उनपर खरा उतरके दिखाने की जद्दोजहद।
फिर लेकर कई सारी जिम्मेदारियां,
लगी रहती है कमाने-धमाने की जद्दोजहद।
फिर ढलने की ओर बढ़ती उम्र में,
नई पीढ़ी को लायक बनाने की जद्दोजहद।
अंततः उम्र के अंतिम पड़ाव पर,
उपेक्षाओं से बचे रह जाने की जद्दोजहद।

गुरुवार, 28 अप्रैल 2022

…......

अनेक झरनों की सर्जक नदी
मैं नही कह सकता स्वयं को।
मुझे नदी से निर्मित झरना ही
मानना होगा स्वयं को।
नदी तो कोई स्त्री ही कहला सकती है।

कल कल बहती हुई लम्बी दूर तय करती
प्रवाहमान,चंचल,अविरल नदी से
नही कर सकता पुरुष स्वयं की तुलना
उसे स्थिर समुद्र ही कहलाना होगा।

मैं अविराम,अल्हड़,अनवरत बहती
हवा भी नही कह सकता स्वयं को
मैं कहला सकता हूँ हवा का एक झोंका

पुरुष मिट्टी,धरती,प्रकृति,समिष्टि आदि
कोई भी उपमा नही दे सकता स्वयं को
उसे कहलाना होगा इनपर आधारित
कोई अति लघु,अल्प महत्तम उत्पत्ति ही।

जब पुरूष पत्थर कहेगा स्वयं को,
स्त्री चट्टान बनकर बड़ी हो जाएगी।
जब पुरूष पर्वत कहेगा स्वयं को,
स्त्री पर्वत श्रृंखला बनकर बड़ी हो जाएगी।
जब पुरुष बनेगा सौर मंडल
स्त्री आकाशगंगा बनकर बड़ी हो जाएगी।

संसार,अंतरिक्ष,ब्रह्मांड आदि,
हैं कुछ वृहत्तर अपवाद
किंतु इन सब की उत्पत्ति सृष्टि तो
स्त्री ही कहला सकती है।

महत्तम उपमाओं का विस्तृत विस्तार,
स्त्री सूचक शब्दों से ही गठित होता है।
पुरूषों के हिस्से आये हैं बस कुछ अपवाद।

तुम सुनना भूल गए थे

"तुमने जंगल उजाड़ते वक़्त
वृक्षों का करुण क्रंदन सुना था?

जब तुमने फूल तोड़ा
फिर उसकी पँखुड़ियाँ 
बिखेरते वक़्त
कलियों का रुदन सुना था?

तुमने नदियों को टोका
फिर बांध बनाया
तब लहरों का 
विद्रोह स्वर सुना था?

जब कर रहे थे परमाणु परीक्षण
तब विस्फोट करते वक़्त
भूमि का क्रुद्ध कंपन सुना था?

तुमने खनिज खोजे
किया आदिवासी विस्थापन
तब उन वनचरों का दर्द सुना था?

तुमने किया था बहुत कुछ
लेकिन बहुत कुछ सुनना
भूल गए थे।"

कविताओं की चालाकियां

उसने लिखी थीं बेलौस कविताएँ 
जब उसे भान नही था,
कविताओं की चालाकियों का।

जब बारीकियां समझीं कविताओं की।
तब कविताओं के माध्यम से 
भ्रम फैलाए और मिथक गढ़े।

बुधवार, 27 अप्रैल 2022

तृण मात्र सा मैं

होता तृण मात्र सा मै।
हवाओं में उड़ता,
नियंत्रित होता उनके वेग से।
फिर कोई चिड़िया,
चोंच में दबाकर ले जाती।
बना देती हिस्सा अपने घोंसले का।
बनता मै।
अंडों के फूटने,
बच्चो के पलने,
बड़े होने। 
फिर उड़ कर अन्यत्र चले जाने की।
पूरी प्रक्रिया का दर्शी। 
उजड़ जाता घोंसला 
फिर समय के साथ। 
और बिखर जाता मैं 
किसी पेड़ के पास। 
फिर दब कर 
समय दर समय मिट्टी में।
चला जाता गहराई में। 
बन जाता फिर 
जीवाश्म का कोई अशेष। 💙

"नई नस्लों का जीवन धन्य कर दो"

तितलियों में थोड़ी और रंगत भर दो। जुगनुओं में थोड़ी और चमक भर दो। फूलों को ज्यादा खुशबुएँ दे दो। हिमानियों को अधिक सुदृढ़ कर दो। जल धाराओं को अ...