शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2015

कौन है तू

कौन है तू जो मुझमें बसता है,
मेरी भावनाओ को टटोलकर 
ना जाने क्या कहता है।
बेरुखी में भी तू 
वफ़ा के रंग भरता है।
में कहता हूँ छोड़ दे,
ये वहम का बंधन थोड़ दे।
ना जाने क्यों तू 
शांत सा रहता है।
थामे रख तू डोर 
मुझसे हरपल कहता है।
मैं पर्दा डालता हूँ दिल पे,
तू उठा देता है।
मैं सम्हालता हूँ दिल को 
तू लूटा देता है।
में रोकता हूँ ये कदम 
तू बहका देता है।
में बांधता हूँ भावनाओ को 
तू जता देता है।
में मिलना चाहता हूँ सागर से 
तू राह मोड़ देता है।
में भागता हूँ मंजिल की ओर 
तू साथ छोड़ देता है।
तेरा होना मेरी राह की बाधा है ,
पर लगता है तेरा बिना सब आधा है।
हैं मुझमें ही तू मेरा हिस्सा है ,
औरों को क्या कहूँ 
ये मर्ज तो खुद का है। 


सोमवार, 2 फ़रवरी 2015

अंतर्द्वंद

"खुद से खुद का चल रहा द्वन्द है।
 वर्तमान की भावनात्मक पूर्ति,
और भविष्य की मजबूत  जमीन
के बीच प्रतिद्वंद है।

एक ओर जिंदगी के हर छोटे-छोटे पल को,
खुल के जीने की चाह है, 
दूजी ओर जीवन को,
सफल साबित करने की राह है।

जीवन  का एक पलड़ा,
अब की संस्तुष्टि  की ओर  झुका है,
दूसरा,
आने वाले कल के निर्माण पर टिका है।

छणिक चाह और दूरगामी विश्वास की,
मजधार में,
झूल रहा है मन का शहर।

ढूंढ रहा है हर पहर अब,
राहत की लहर।

 एक ओर आत्म संस्तुष्टि है,
 दूसरी ओर खुद को साबित करने की वृत्ति है.
चिंतनीय के मसला,
सही कौन सी मनोदृष्टि है।


सत् पथ  क्या है,
पड़ाव कौन  सा है,
मन सार्थक है,
या मष्तिष्क,
आत्म सत्य है,
या परार्थ,
कशमकश में है,
हरपल।
मै सही है या हम "



शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

नयी उमंग

एक तरंग सी है मन में,
नयी उमंग सी है मन में।

बीते वक़्त की चंचलता ,अल्हड़ता
और अस्थिरता  को इतर कर,,
सुनहरे भविष्य निर्माण की चाह ,
प्रचंड है मन में।

नियत को बांधकर , शीरत को जानकर,
 अंतर्मन की विकृति को मानकर।
अपराध-बोध की आह,
का बंधन तोड़ ,,
सार्थकता की आवृत्ति असंख्य है मन में।

कोई कहता है जूठा सा, कभी लगता है टुटा सा ,,
थरथराता सा दम्भ है मन में।

मतलब के रिश्तो , फरेब के किस्सों,,
भावना के व्यंग-हाल से होकर मुकर
जीना है ऐसे की , ना हो कोई फिकर।

 संवेगात्मक अतिशियोक्ति , बेसुध अभिव्यक्ति,,
अनकहे सब्दो को जेहन में कर दफ़न।
मुस्कान की चादर ओढ़,
सवारना है जीवन को जिसका न हो कोई छोर।

कमजोर पड़ती उम्मीद, धुंधली  सी लकीर,,
हृदय की भरमाहाट का भान कर,
रिश्तो की मार्मिकता को जानकार,,
मजबूत कदमो से मंजिल की राहपर चलना है।


शनिवार, 27 दिसंबर 2014

कितने दूर कितने पास?

                                       
"तुम मुझे भूल जाओ,
 मै तुम्हे भूल जाता हूँ।
 विरह की नौका पर बैठकर,
 अश्रुधारा पर पतवार चलाता हूँ। .

बेरुखी तुम दिखाना,
 मै रुख बदल लेता हूँ।
नम आँखों से,
यादो के समंदर में गोते लगाता हूँ।

किताब के पन्ने पलटते-पलटते,
वो फूल मुरझाया सा नजर आएगा।
घूमने लगेगा तेरा चेहरा आँखों के सामने,
 वक़्त ठहर सा जायगा।

जिन्दी चलती रहेगी अपनी रफ़्तार स,
 कभी नजरो से सामने वो बगीचा आएगा।
नरजे दौड़ेंगी अतीत की ओर,
कुछ धुंधला सा तेरा-मेरा चेहरा नजर आएगा।

कभी सब्जिया लेते हुए बाजार में,
एकाएक कोई मुझसे टकरायगा,
सिहर उठेंगी साँसे,
 फिर यादो का सैलाब,
अतीत के पन्नो की ओर,
समेट ले जायगा.

अरमान फिर मचलेंगे
बेकरारी फिर बढ़ेगी
तू मेरा है में तेरा हूँ,
अकेले तनहा अब कौन कहा जायगा" 

सोमवार, 15 दिसंबर 2014

नज़्म - 1

तनहाइयों में तुझे गुनगुनाता हूँ,
बस तुझी में डूब जाता हूँ।
तू राहत है,तू चाहत है,
मेरी अनकही सी इबादत है।

होंठो पे तेरी रंजिस है,
साँसों में तेेरी बंदिश है।

दो कदम चलकर रुक जाता हूँ,
जाने क्यों तेरी ओर मुुुड़ जाता हूँ।

कस्तूरी सी तू मुझमें बसती है,
नजरे तेरी तलाश में भटकती हैैं।

तुुझे खयालो में बांध कर ही 
उपजी हर कविता है।
जो मुझमें बहती है,तू वो सरिता है। 

विश्व के निर्माता के लिए

खोज है तेरे अस्तित्व की 
अलौकिक तेरे कृतित्व की।
हवा में बहते तेरे नाम की,
सांसो में बसे तेरे एहसास की।
जमीं के इस छोर से लेकर,
उस छोर तक फैला सा है;
पर ना जाने क्यों धुंधला सा है।
तुझसे होता आगाज है, 
अंत भी तेरे  ही साथ है।
धरा से लेकर आसमान तक, 
लहरें तेरी गूंजती हैं,
तू सत्य है या भ्रम रूह पूछती है ?

बिना अस्तित्व के 
ये कैसी सत्ता है
कहते है तेरे नाम से 
हिलता हर पत्ता है।   
      
कही सुनता हूँ तू निराकार है
फिर कैसे बंधा तेरा अकार है।
कहते है तू आत्म में बसता है
फिर क्यों मनुष्य तुझे 
मंदिरों में ढूंढता है।

जब सच्चे मन से 
याद करने में ही तेरा साथ है
फिर जटिल रस्मो की क्या जात है?

कहते है परहित में ही तेरा साथ है
फिर पत्थर की मूरत पर
क्यों चढ़ता प्रसाद है?

मंजिल सबकी जब एक है 
फिर क्यों रास्ते को लेकर विभेद है

कहते है तू एक है 
फिर तेरे नाम पर 
बने क्यों पंथ अनेक हैं?

खोज रहा हूँ खोजता रहूँगा।
स्वयं के भीतर तेरा अस्तित्व,
ये सोचता रहूँगा।

रविवार, 7 दिसंबर 2014

इन्सान हूँ मैं

इन्सान हूँ मैं।
कभी मैं लोभी बन जाता हूँ
कुछ चीजे मुझे आकर्षित करती हैं।
कभी क्रोध भी आता है मुझे 
कुछ बातें मुझे अधीर करती है
कभी मैं फरेबी भी हो जाता हूँ
कुछ खोने का डर सताता है मुझे
कई चेहरे हैं मेरे समय समय पर उभरते हैं
परिस्थितियां प्रभावित करती हैं मुझे।
महत्वकांछी भी हूँ मैं खुद को अलग दिखाने की 
कोशिश करता हूँ नजरो का केंद्र बनने के लिए
हाँ मैं गलतिया भी करता हूँ
कुछ बाते विचलित करती हैं मुझे।
रंग भी बदलता हूँ कभी गिरगिट की तरह 
डरता हूँ कुछ बातों के होने से।
शर्मिंदा भी होता हूँ मैं 
हाँ वक़्त लगता है 
गलती का एहसास होने मे।
कभी भावनाओ मैं बह जाता हूँ 
चंचल है मन मेरा डोर तोड़ देता है।
कभी संकोच करता हूँ
कुछ कहने मैं कुछ बाते 
असहज करती हैं मुझे।
इन्सान हूँ मैं।
दया,क्रोध,शर्म,लोभ,काम,
नफरत, प्रेम,अपनत्व,अलगावो 
सभी भावो से चरित हूँ मैं।

"नई नस्लों का जीवन धन्य कर दो"

तितलियों में थोड़ी और रंगत भर दो। जुगनुओं में थोड़ी और चमक भर दो। फूलों को ज्यादा खुशबुएँ दे दो। हिमानियों को अधिक सुदृढ़ कर दो। जल धाराओं को अ...