"बह जाऊ कहीं,
उड़ जाऊ कहीं,
ना किसी का जिक्र,
ना किसी की फ़िक्र,
कहना भी मेरा हो,
सुनना भी मुझको हो,
ना किसी से कुछ चाहत हो,
ना किसी की आदत हो,
बस खुद से उम्मीदे,
टूटना भी खुद से हो,
रूठना भी खुद से हो,
बस जो हो मेरा हो,
सिर्फ मेरा हो,
दुनिया से ना कुछ लेना हो,
दुनिया को ना कुछ देना हो,
मुझ संग राते मेरा ही सवेरा हो।"
"चल अविनाश अब चलते है मन की उड़ान हम भरते हैं. बंद आँखों की बातो को,अल्हड़ से इरादों को, कोरे कागज पर उतारेंगे अंतर्मन को थामकर,बाते उसकी जानेंगे चल अविनाश अब चलते है मन की उड़ान हम भरते है"
मंगलवार, 5 जुलाई 2016
स्वमेव
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