मंगलवार, 26 अप्रैल 2022

अंतर्द्वंद्व

मै बेचैनियों की कसक ढूंढ रहा था
कुछ लिखने के लिए।

अपने हालातों से रश्क़ नही था।
किसी और का दर्द ढूंढ रहा था
कुछ लिखने के लिए।

मै उदास नही रह पाता था।
कुछ कड़वे वहम ढूंढ रहा था
कुछ लिखने के लिए।

शब भी सपाट सी बीत जाती थी।
किसी के जाने का गम ढूंढ रहा था
कुछ लिखने के लिए।

मलाल नही होता था कुछ छूट जाने का।
कुछ न मिल पाने का सबब ढूंढ रहा था
कुछ लिखने के लिए।

मेरे मन को छूकर मुझे तन्हा छोड़ जाओ।
किसी से जुदाई के अश्क़ ढूंढ रहा था
कुछ लिखने के लिए। 

प्रेम की परिणीति

जब तुम्हारे भाव-आडंबरों के मध्य छिपा
मूल भाव ढूंढ लूँगा।
तब समझूँगा की प्रेम की परिणीति हुई।

जब तुम्हारी हँसी के
नैसर्गिक और दिखावटी स्वरूप में
अंतर कर लूँगा।
तब समझूँगा की प्रेम की परिणीति हुई।

जब तुम्हारे रूखे शब्दों के आवरण में सांस लेते
प्रेमांकुरों की पुष्टि करने लगूँगा।
तब समझूँगा की प्रेम की परिणीति हुई।

जब शब्दों से परे होकर
बातें करने लगूँगा तुम्हारी भाव भंगिमाओं से
तब समझूँगा की प्रेम की परिणीति हुई।

क्योंकि,
किसी के मूल अस्तित्व से
जुड़ जाने में ही तो
प्रेम की परिणीति है।

नव कोंपलें

इन कोमल कोपलों को देखकर
मन मे प्रश्न उठता है कि-

पतझड़ के बाद
जब नव कोपलें फूटी थीं
तब कौन था उनका प्रथम दृष्टा?

:- जब वृक्षों से पत्ते गिर रहे थे
तब जिसकी दृष्टि में होगा
टूटता हुआ अंतिम पत्ता।
उसी ने किया होगा
प्रथम साक्षात्कार
नव पात का।

- लेकिन ऐसा क्यों?

:- क्योंकि अंतिम बिंदु तक टूटकर
पुनः नव उमंगें पालने वाले कि दृष्टि ही
होती होगी सबसे पवित्र।

- तो इस बात का
नई कोपलों के स्फुटन से
क्या संबंध?

:- संबंध है,
क्योंकि नई कोपलों का फूटना
संसार की सबसे पवित्र
प्रक्रियाओं में से एक है।

- तुम्हारी ये बातें हमेशा की तरह
आधी डब्बा गोल हो जाती हैं
लेकिन सुनकर अच्छा लगता है।

:- कोई बात नही समझने से ज्यादा महत्वपूर्ण है
तुम्हे अच्छा लगना।

उदासियाँ


आदतन ख़ुश रहता हूँ मैं
उदास नज़्मों के पीछे से झाँकते
मुस्कुराते हुए चेहरों को ढूंढ़ता हूँ।
उदासी तो मुस्कान की ही
कोई रूठी सहेली होगी।
उसे मनाने के तरीके सोचता हूँ।

मेरे सपनों में,
सूख चुकी जमीन की दरारों से
कोई बेल निकल आती है,
जो खड़ी करती है
श्वेत पुष्पों की पंक्तियाँ।
और उन पुष्पों के रस को चखने,
आता है रंगीन तितलियों का जत्था।

उदासी के पास भी बहुत से रंग होंगे।
जिनमें शायद सबसे उदास रंग ही,
हँसता हुआ नजर आता होगा।

वो बेनाम उदासियाँ जो
हँसी में परिवर्तित हो जाती हैं।
मैं उनसे ही उनकी
कहानियां सुनना चाहता हूँ।

मैं सोचता हूँ कि
वो उदासियाँ ही तो होंगी।
जो करती होंगी,
सबके खुश रहने की प्रार्थना।

.…......

ठहरने को मुनासिब
इक जगह नही थी।
लौटने को मुनासिब
इक वजह नही थी।

अनवरत चलता रहा
पलायन का सिलसिला।
स्थायित्व रूठा रहा मुझसे,
उसे मनाने कि
मुझे गरज नही थी।

चंद रातों को ठहरकर
कुछ ख़्वाब देखे।
चंद दिनो की भागमभाग में
तोड़ दीं ख़्वाबों की कड़ियां।
ख़्वाबों के कारोबार में
अब बसर नही थी।

दिल लगाने को
कुछ पल ही ढूंढे।
दिलों में बसने की
कोई जुगत नही की।

गुरुवार, 21 जनवरी 2021

जीना-मरना

हर रोज मरता हूँ,

हर रोज जीता हूँ।

न मैं मर पाया पूरा,

मेरा जीना भी रह गया थोड़ा।

कुछ तो रह गया अधूरा।

जीना भी है,

और मरना भी है।

ये अवश्यसंभावी है,

सबको करना ही है।

जिया तब जब मन,

खुशहाल रहा।

मरा तब जब अंदर से,

बदहाल रहा।

ये खुशहाली-बदहाली,

धूप छाँव जैसी हैं।

कदमों से टकराते,

आते-जाते पड़ाव जैसी हैं।

- अविनाश कुमार तिवारी

मंगलवार, 1 दिसंबर 2020

विविधता में एकता को अंगीकार करने वाला सनातन धर्म

 हम विष्णु जी,ब्रह्मा जी,शिव जी,गणेश जी तथा सूर्य देव को लेकर पंचदेवोपासना की परंपरा का निर्वहन करते हैं। चारों दिशाओं के लिए हमारे देवता हैं :- उत्तर में सोमदेव,दक्षिण में यम देव,पूर्व में इन्द्रदेव और पश्चिम में वरुण देव।

हमारे धाम भारत की चारो दिशाओं में हैं  उत्तर में बद्रीनाथ, दक्षिण में कांची, पूर्व  में पूरी और पश्चिम में द्वारिका।

अयोध्या,मथुरा,माया(हरि द्वार),काशी,उज्जैन, कांची,द्वारिका आदि हमारे सात मोक्ष दायी स्थान सम्पूर्ण भारत मे विस्तृत हैं।

हमारा धर्म दो मुख्य धाराओं में बंटा है और हम दोनों को साथ लेकर एक सूत्र में पिरोते हैं।

एक वैष्णव धर्म(भागवत सम्प्रदाय) है जो कि पहला सम्प्रदाय जिसने ब्राह्मण धर्म की बुराइयों के प्रति सुधारात्मक रुख दिखाया जिसके पथ प्रदर्शक वासुदेव कृष्ण ही थे।

कृष्ण जिनके मानवीय स्वरूप का प्राचीनतम संदर्भ - छन्दोग्य उपनिषद में मिलता है। फिर पाणिनि अपनी अष्टाध्यायी में सर्वप्रथम भगवान के दैवीय स्वरूप को लिपिबद्ध करते हैं।

इसी से जुड़े हुए 7वी से 9वी शताब्दी के मध्य आलवार संत हुए जो दक्षिण भारत मे भ्रमण करके वैष्णव धर्म का प्रचार करते थे जिनकी सँख्या 12 थी।

ऐतरेय ब्राह्मण है जिसमें में विष्णु सर्वप्रमुख देवता के रूप में वर्णित  होते हैं। वहीं शतपथ ब्राह्मण में आदि नारायण का सर्वप्रथम उल्लेख मिलता है।

दूसरा शैव धर्म है जो अपने अंदर  सात सम्प्रदायों पाशुपत,कापालिक, लिंगायत,कालामुख,कश्मीरी शैव,नाथ तथा शाक्त आदि को समाहित करते हुए चलता है।

इसमें नयनार संत हुए जो यहाँ वहाँ भ्रमण करके भजन गाते हुए शैव धर्म का प्रचार करते थे इनके भक्ति गीतों को देवारम मे संकलित किया गया है।

जब सेल्युकस के साथ मेगस्थनीज भारत आते हैं तबअपने भारत वर्णन में वो कृष्ण को हेराक्लीज और शिव को डायनोसस कहते हुए दोनो ही को वर्णित करते हैं।

हमारी सनातन धारा के अंदर - वैष्णव सम्प्रदाय का विशिष्टाद्वैत वाद है जो रामानुज द्वारा प्रतिस्थापित है। ब्रह्म सम्प्रदाय का द्वैतवाद है जो मध्वाचार्य द्वारा प्रतिस्थापित है। रुद्र सम्प्रदाय का  शुद्धाद्वैत  है जो वल्लभाचार्य द्वारा स्थापित है। सनक सम्प्रदाय का द्वैताद्वैत  हैं निम्बार्काचार्य द्वारा स्थापित है। शंकराचार्य द्वारा स्थापित अद्वैतवाद है।

इतनी सारी धाराओं,इतनी सारी शाखाओं को एकमेव करके निर्मित होता है वसुधैव कुटुम्बकम के प्रेरणा स्रोत सनातन धर्म का वट वृक्ष।

~ अविनाश कुमार तिवारी

"नई नस्लों का जीवन धन्य कर दो"

तितलियों में थोड़ी और रंगत भर दो। जुगनुओं में थोड़ी और चमक भर दो। फूलों को ज्यादा खुशबुएँ दे दो। हिमानियों को अधिक सुदृढ़ कर दो। जल धाराओं को अ...