सोमवार, 23 जुलाई 2018

जब कलम ने रचना गढ़ी थी

"जब प्रसाद  ने कामायनी लिखी थी!
तब उभरी होगी जेहन में,
छवि मनु की।
हुए होंगे बिम्बित चित्र नव जीवन के ,
आँखों में उनकी।

 जब दिनकर ने रश्मिरथी लिखी थी!
 तब देखा होगा राधेय कर्ण को,
 होते हुए विजित,
 सामजिक व्यवस्था से।

 जब बच्चन ने मधुधाला लिखी थी!
 तब देखा होगा उसने हाला में
 जीवन की पाठशाळा को।
 टंकित  होगा धर्म का सार,
 मधुकलश में।

जब टैगोर ने गीतांजली लिखी थी!
तब किया होगा, श्रृंगार काव्य का
जीवन के हरपक्ष ने।

जब किया था प्रेमचन्द ने,
साहित्य का संधान!
तब उपजा होगा जीवनवृत्त
हर व्यक्ति का आत्मन में उनके।

जब पंत ,महादेवी और निराला ने,
चुना था छायावाद!
तब आई होगी प्रकृति लेकर
अनगिनत भाव।

जब रची थी नीरज और दुष्यंत ने
गीतो की माला!
प्रेम,विरह,साहस सब आएँ होंगे,
बनकर भावों की रंगशाला।"

प्रेरणा दी थी सबको!
कभी प्रकृति,कभी परिस्थिति
कभी  वृत्ति ने।"

शुक्रवार, 15 जून 2018

उड़ जाएगा हंस अकेला

अकेली उड़ान देखी है तुमने?
हाँ देखा है अकेले उड़ते लेकिन अक्सर बड़े पंछियों को।
छोटे-छोटे पंछियों को अक्सर देखा है मैंने भीड़ के साथ उड़ते हुए!
इसी तरह मनुष्य भी तो समाज के इतर नहीं जा पाता है।
वो डरता है समहू से दूर होने से।
वो डरता है उन चीजो को करने से जो सब नहीं करते। 
न जाने कितनी आकांक्षाओं को वो दबा लेता है,अंतर में ही क्योंकि वो डरता समाज से हट कर कुछ करने से।
लेकिन इतिहास लिखने के लिए अक्सर करना पड़ता है कुछ अस्वाभाविक, तोडना पड़ता है वर्जनाओ को।

ज्यादा मुश्किल नहीं है अलग होना!

ज्यादा मुश्किल नहीं अलग होना!

बस कुछ छोटी छोटी बातें हैं।
बस ये कार तुम्हारे नाम पर है,जिसके लोन की कुछ किस्ते पटानी अभी बाकि है। ये घर भी तो तुम्हारे नाम पर लिया है मैंने जिसका लोन मै हर महीने चुकाता हूँ। बच्चो को स्कूल मै छोड़कर आ जाता हूँ घर तुम ले आती हो।
तुम्हारे आने के बाद घर का बना खाना भी मुझे मिल जाता है,सेहत भी अच्छी रहती है। तुम्हारे लिए ही  एलआईसी की पॉलिसी भी करवा के रखी है मैंने। अब ऐसी कोई और खोजने में क्यों इतनी मेहनत करूँ पता नहीं मिलेगी भी की नहीं।

हाँ छोटी छोटी बाते ही तो हैं कुछ।
तुमसे मिलने के बाद ही तो मै नखरे करना सीख गई नहीं तो कौन मेरी छोटी छोटी फरमाईशों पर ध्यान देता।
जब घर में बोर होती हूँ तो तुमसे फोन पर लड़ के बोरियत दूर हो जाती है। तुमने ही तो मुझे बताया की हाउसवाइफ के लिए भी हप्ते में एकदिन छुट्टी का दिन होता है जब तुम घर के सारे काम पुरे कर देते हो। तुम नही होते तो कौन सुनता मेरी बेमतलब की बातों को। कौन मेरी तारीफ करके मुझे खुश करता। कौन होता है जिसके साथ मै सुरक्षित मससूस करती। अब मेरी  उम्र के 35 साल बीत जाने के बाद ऐसा दूसरा कोई कहाँ मिलेगा।

अच्छा सुनो थोड़ी बहुत लड़ाई कर लेंगे छोटी मोटी बातों को भूल जाएँगे। पर साथ में ही रहते हैं। हाँ सही बोल रहे हो तुम।

मंगलवार, 16 जनवरी 2018

एक पत्ते और उस टहनी के बीच की बातें अधूरी रह गईं

"एक टहनी जो पेड़ से अलग हो गई।
पेड़ के एक पत्ते और उस टहनी बीच की बातें अधूरी रह गईं।
क्यों अलग कर दिया लकड़हारे ने टहनी को पेड़ से?
क्यों रह गईं दोनों की बातें अधूरी?
ऐसे ही कितना कुछ अधूरा रह जाता हैं। "

ये वो दौर था जब सांप्रदायिक विचार अपने चरम पर थे। यही वो दौर था जब दोनों की भेंट  हुई थी। बलूचिस्तान  क्षेत्र  का एक छोटा सा गाँव था। समरसपुर,, समरस का एक अर्थ घुलमिल कर रहना भी होता है। उसी प्रकार उस गाँव में सभी समुदायों के लोग सांप्रदायिक और जातीय बंधनो से परे मिलकर रहते थे। सिख और मुस्लिम सम्प्रदायों की बहुलता थी वहां।

मंजीत और साहिल दो 12 -13 वर्षीय बालक पेड़ रूपी उस गाँव की एक टहनी और पत्ते की तरह एक दुसरे  के घनिष्ट  मित्र थे।

ये 1947  का भारत की स्वतंत्रता , विभाजन और राजनितिक उथल-पुथल का दौर था। देश  में सांप्रदायिक अलगाव भी अपनी परिणीति पर था। सभी सिख परिवार बलूचिस्तान जो की पाकिस्तान का हिस्सा था उसको छोड़ कर भारत जा रहे थे।
                              इसी  क्रम  में मंजीत का परिवार भी समरसपुर छोड़ कर भारत की और आ  गया। साहिल और मंजीत भी एक दूसरे से अलग हो गए।

                  "मंजीत रूपी टहनी पेड़ से अलग ही गई। पत्ते रूपी साहिल और उसकी बातें अधूरी रह गईं।
वो लकड़हारा साम्प्रदायिकता थी जिसने टहनी और पेड़ से अलग कर दिया।"

बुधवार, 10 जनवरी 2018

सन्दर्भ ऐतिहासिक है पर वर्तमान भी बहुत हद तक प्रभावित है

आधुनिक विद्वान भारत को आम लोगो की नजर से देखना समझना नहीं चाहते। वो तो अपनी ही कृत्रिम दुनिया में रहते हैं। उनको इससे बहुत फर्क नहीं पड़ता कि भारत के आम नर-नारियों का दूसरे लोगो से,सृष्टि से या दूसरे जीवो से क्या सम्बन्ध है? उनके लिये पश्चिमी मानदंडो पर खरा उतर जाना ही अधिक आवश्यक है।
वास्तव में आम आदमी के जीवन में जाने अनजाने कितना पश्चिमीकरण हुआ है,हुआ भी है या नहीं ऐसे सवालो पर सार्वजनिक जीवन में चर्चा सामान्यतः नहीं होती। जो लोग भी सार्वजनिक जीवन में हैं, उनको आम लोगो की वास्तविक स्थिति के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। जिन्हें जानकारी है वो सार्वजनिक जीवन के विमर्श में भाग नहीं लेते और आम लोगो के पक्ष का प्रतिनिधित्व करने नहीं आते। आधुनिक भारत के पढ़े लिखे लोगो को लगता है कि हमारे देश के साधारण लोग तो आलसी हैं। अंग्रेजो ने जो जो कहा और दोहराया कि "तुम्हारे ग्रंथो में ऐसा लिखा है", यह पढ़े लिखे भारतियों के मन में बस गया। जैसे अंग्रेजो ने जानबुझकर यह मिथक गढ़ा कि हजारो बरस से हमारे यहाँ दरिद्रता है , वर्षो से हमारे यहाँ छुआछुत कायम है। ऐसी मान्यताओ का कोई ऐतिहासिक आधार नही है। ऐसे मिथक अंग्रेजो द्वारा अपने राज्य को वैधता देने के लिए शोध के नाम पर गढे गए।
परन्तु मानसिक रूप से बीमार इन लोगो ने इसे बिना परीक्षण किये स्वीकार कर लिया। किसी ने ये पूछना जरुरी नही समझा की इन बातों के ऐतिहासिक आधार कहाँ है? पूछने पर कुछ कुतर्की कहते हैं की मनुस्मृति में है या कहीं और है। ये भी नही कहते की मनुस्मृति में क्या है?? इसके अतिरिक्त अन्य कौन कौन सी स्मृतियाँ इन स्मृतियों का आपस में क्या संबंध है इनका तात्कालीन समाज से क्या सम्बन्ध था? इनका समाज पर क्या प्रभाव था? था भी या नहीं ? ऐसे प्रश्नों को दरकिनार करना आजकल भारत में बोद्धिक फैशन सा बन गया था और इसके निर्माण में साम्राज्यवादियों ने बहुत मेहनत की थी।
राबर्ट क्लाईव के ज़माने में ही अंग्रेजो को समझ आ गया था की भारतियों को कुछ भी तय करने में देर लगती है।भारतीय लोग स्वाभाव से योजनाबद्ध नहीं होते। विरोधियो द्वारा कुछ भी अचानक करने पर वो लड़खड़ा जाते हैं।
भारत के लोग हवा का रुख देखकर अपनी रणनिति बादल लेते है। अगर परिस्थितियां बदली तो भारत के पढ़े लिखे लोग आसानी से बदल जाते हैं। मध्यकाल में ये पढ़े लिखे लोग आसानी से अरबी-फारसी में सूफियों की भाषा और इस्लामिक प्रगतिशीलता के गीत गाने लगे। यही कार्य उन्होंने अंग्रेजी राज में भी किया।
और अंग्रेजो की देखा देखी भारत की सभ्यता और संस्कृति की कठोर आलोचना करना पढ़े लिखे भारतियों के बीच लोकप्रिय हो गया।
क्रमशः ........................

शनिवार, 23 दिसंबर 2017

तुम पहली बार रूठे थे सच में

 "सुर्ख लबों से,
  तीक्ष्ण शब्द,
  बरस पड़े थे,
  बरबस।

  आँखों में भी,
  मुखातिब हो रही थी,
  अनमनी और,
  बेरुखी सी।

  न जाने क्यों,
  ऐसा रुख,
  इख़्तियार किया था,
  तुमने।

  इतनी झुंझलाहट,
  इतने बेरुखात,
  पहली दफा थे।

  बेसवाल और,
  बेजवाब था मै।

  हाँ ये वहीँ दिन था,
  जब बहुत से,
  झूठे नखरो के बाद,
  तुम पहली बार,
  रूठे थे सच में।

शुक्रवार, 22 दिसंबर 2017

कैसा ये द्वैतभाव है

नींदे बेचैन हो गईं हैं,
कसक सी उठी है।
बलखा रहीं हैं साँसे,
लहर सी उठी है। "

राहें टेढ़ी-मेढ़ी हैं,
कदम यहाँ-वहाँ हैं।
आँखों में मद सा है,
जर्रा-जर्रा बहका है।

कुछ ढल रहा है,
या कुछ उभर रहा है।
कुछ टुटा है,
या कुछ जुड़ रहा है।

पतझड़ है या बहार है,
संभावनाएँ तो अपार हैं।
मातम है या त्योहार हैं,
पुचकार है या दुत्कार है।

उदय है या अस्त है,
अंगड़ाई है या जम्हाई हैं।
वात्सल्य है या रुसवाई है,
मिलन हैं या जुदाई हैं।

कैसा ये द्वैतभाव है,
प्राप्ति है के आभाव है।
उलझा है ये मसला,
ये क्या है ये कैसा है।

"नई नस्लों का जीवन धन्य कर दो"

तितलियों में थोड़ी और रंगत भर दो। जुगनुओं में थोड़ी और चमक भर दो। फूलों को ज्यादा खुशबुएँ दे दो। हिमानियों को अधिक सुदृढ़ कर दो। जल धाराओं को अ...